(Music)
Announcer1: This is Meter Down podcast
'Bombay Taxi Drivers Write the City' in conversation with Kabi.
Kabi: Welcome to the 3rd
episode of the Meter Down podcast. Today, we speak to Gupta ji. He has been
driving Taxi since 1967, that is 40 years. He speaks of Bombay in the time of
mills and he laments about the fault lines that have occurred in our city, post
1993 and he tells us his story. My name is Kabi and I am an ex taxi driver.
Lallan Gupta: हमारा
नाम है लल्लन
गुप्ता। मैं
बनारस से एक २५
किलोमीटर
पीछे चुनार
स्टेशन का
रहने वाला हूँ।
चुनार। तो मैं
बॉम्बे में
आया हूँ ५७
में। मैं
नाबालिग था।
मेरा उमर कम
था १५ साल जब
फिर मेरा १८
साल का उमर
हुआ तो मैं
टैक्सी का
लायसेंस निकाला
-- ड्रायविंग
लायसेंस निकाला
और ड्रायविंग
लायसेंस
निकाल कर के
मैं नौकरी
करता था हाई
कोर्ट जज के
पास। फिर ६
साल मैंने
नौकरी किया। ६
साल के बाद
में फिर मैं
टैक्सी बैज
बनाया। फिर उसके
बाद मैं
टैक्सी चलाना
शुरू किया।
Kabi: तो जब आप आया, आप
१५ साल का था।
तो आप चलाया?
Lallan Gupta: नहीं।
हमारा भाई एक
पहला यहाँ पे
था। वो बहुत
गरीबी हो गया।
हम लोग का जो
धन्धा है, तेल
का, वो पहला
ऑयल निकालते
थे गाँव में, वो
बैल के साथ।
Kabi: तेली?
Lallan Gupta: तेली, तेली।
Kabi: हाँ, तेली?
Lallan Gupta: हाँ, हमारा
धन्धा तेली का
था। तो जब
मशीन आ गया
१९५४ में ऐसा
कुछ जो भी आया
होयेगा, या तो
५० में आया
होयेगा, हम
लोग का धन्धा
बहुत कम हो
गया क्योंकि
मशीन का तेल
जो बिक रहा है,
सस्ता, और
हमारा तेल
महँगा, क्योंकि
मशीन का तेल
जो है वो बहुत
गार करके उसको
निकालते हैं
उसको और हमारा
तेल जो है
अच्छा तेल था
फिर भी लोगों
को पसन्द नहीं
आया. जब उनका
धन्धा बहुत
कमजोर हो गया
तो मैं वहाँ पे
४ क्लास में
पढ़ता था
हिन्दी में।
तो फिर पिताजी
ने बोला कि
हमारा अब तेल
नहीं बिक रहा
है अभी और हम
जो भी तेल के
लिये पैसा
देते हैं -- सामान
के लिये, तो वो
तेल बेचने पे
उतना ही पैसा
होता है तो अभी
आप लोग कुछ भी
काम करो और हम
नहीं जानते
हैं, अब हमारी
जबाबदारी खतम
हो गई।
Kabi: तो जब आप आया
था, १५ साल का
लड़का, आप भाई
के साथ आया?
Lallan Gupta: भाई के
साथ आया।
Kabi: और क्या
क्या ले के
आया उस टाइम
पे? एक सूटकेस
था। एक सूटकेस
में क्या था?
Lallan Gupta: नहीं। एक
सूटकेस था। दो
चार कपड़े थे।
और कुछ खाने
पीने का चीज़
था जो माँ ने
दिया था कि
आपको रास्ते
में काम
आयेंगे। उसको
गुझिया बोलते
हैं जिसे
बॉम्बे में
करंजी बोलते
हैं। ओ उसमें
मीठा मीठा भर
कर के घी में
फ़्राई कर के
दिया जाता है।
Kabi: उसी टाइम पे
आप कहाँ रहते
थे?
Lallan Gupta: मैं
कोलाबा रहता
था। कोलाबा
मार्केट के
अन्दर रूम था।
उस टाइम तो सस्ता
था। दो रूम
लिया था भाई
ने। सिरफ २०००
का लिया था उस
टाइम पे।
Kabi: अच्छा। अपना
खुद का?
Lallan Gupta: हाँ। खुद
का रूम लिया
था। सिंगल रूम
२००० में। फिर
बाद में जो
२००० का लिया
था उन्होंने
१९६० में लिया
था।
Kabi: तो आपका
शादी कैसा हो
गया?
Lallan Gupta: हम
बॉम्बे में ही
शादी किये।
हाँ।
Kabi: बॉम्बे में?
Lallan Gupta: बॉम्बे
में शादी किये
हम। क्योंकि
Kabi: किसने
करवाया? आपके
भाई ने के?
Lallan Gupta: नहीं
किसी ने नहीं।
जब हम मैं बड़ा
हुआ तो भाई
अलग हो गये।
हम मैं भी अलग
हो गया। तो
मैं कुछ दिन
तक ऐसा ही था।
फिर बाद में मैं
एक दोस्त के
घर में रहने
के लिये गया।
तो उसके सामने
जो परिवार था
उनका जो पिता
जी था मेरे
सामने ऑफ़ हो
गया। तो गुज़र
जाने से -- उनके
बाद तीन लड़की
थीं और माँ।
Kabi: भाई नहीं?
Lallan Gupta: भाई नहीं
था। भाई उनको
जनम से नहीं
है। तो वो गरीबी
देख कर के कि
इसको खिलायेगा
कौन, पिलायेगा
कौन, और ये कैसा
रहेगी ये, और
फिर वो एक दिन
वो सोई हुई
थी।
Kabi: कौन? माँ कि?
Lallan Gupta: बीबी। तो
वो सो कर के वो
लोग बात कर
रहे हैं कि मेरी
तबियत भी ठीक
नहीं रहती है
और आज मुझे हम
लोग कौन
संभालेगा?
मेरे -- मुझे तो
ऐसा लगता है।
Kabi: वो बड़ी वाली
थी?
Lallan Gupta: बड़ी वाली, बड़ी
वाली। बोलती
है मैं सादी
बनाउँगी तो
मेरी दो बहन
जो है उनको
कौन संभालेगा?
माँ को कौन
संभालेगा? मैं
तो सादी कर के
चली जाउँगी।
तो मेरे दिल
में ऐसा आया
कि नहीं, इनको
कुछ मदद करना
चाहिये, हम
इंसान हैं और
हम चाहें गाँव
में सादी करें
या अपनी जात
में करें या
पर–जात में
करें, सादी, सादी
होता है और इस
वक्त मुझे
सादी की जरूअत
कम है। ये एक
अच्छी फ़ैमिली
है जो कि आज ये
बहुत गरीब हो
चुकी है। जो
कि अगर से हम
उसको मदद नहीं
करेंगे तो कल
वो आत्महत्या
भी कोइ कर
सकता है
उसमें। तो इसलिये
मैंने उनसे
सादी किया।
हाँ।
Kabi: तो यू पी का
नी है?
Lallan Gupta: नय। नहीं
ये
महाराष्ट्र
के हैं।
Kabi: महाराष्ट्र
है।
Lallan Gupta: हाँ।
महाराष्ट्र
के हैं। वो लोग
बहुत धरम के
हैं तो मैंने
उनके उनके
लिये गुप्ता
से बौद्ध धरम
लिया और मैं
मराठी लड़की से
सादी किया।
Kabi: XX बॉम्बे में
जब आप टैक्सी
चलाना सुरु
किया। ये सब
नेम चलते थे?
Lallan Gupta: हाँ।
बहुत अच्छा
था। वो बहुत
अच्छा जमाना
था। मिल चलता
था। मिल में
मजदूर बहुत
काम करते थे।
डॉक्स था।
डॉक्स के अंदर
बहुत लोग को
माल भेजना, माल
वापस जो लाते
थे। लो जो
वर्कर काम
करते थे।
बॉम्बे में
बहुत चहल पहल -- बॉम्बे
में लगता था
आज कि रोज
दिवाली है
यहाँ पे। हाँ।
बात चीत, खरीदना,
खाना, हर पहली
तारीख को। बॉम्बे
में एक गाना
था किसोर
कुमार का। खुस
है जमाना आज
पहली तारीख
है। हर पहली
तारीख को
रेडियो
स्टेसन से ये
रिकॉर्ड लगता
था। आपने कभी
ये गाना सुना
है?
Kabi: नहीं सुना
हमने।
Lallan Gupta: सुना है?
Kabi: नहीं सुना।
Lallan Gupta: नये हो।
Kabi: सुनाओ।
Lallan Gupta: हाँ तो।
Kabi: गाना आता है
आपको?
Lallan Gupta: नहीं।
गाना पूरा तो
नहीं आता है
Kabi: यों थोड़ी
थोड़ी तो आता
ही होगा।
Lallan Gupta: वो इसके
ऊपर दिया हुआ
है। बस यही
है। खुस है जमाना
आज पहली तारीख
है। बीबी कुछ
अलग च्वाइस करती
है, बच्चे अलग
च्वाइस करते
हैं मरद से, कि
आज हमको ये
दिलाओ, वो
दिलाओ, ऐसा।
पहली तारीख
मीन्स पगार
Kabi: XX थोड़ी
XX.
Lallan Gupta: तनख्वाह
मिलेगा ना।
Kabi: तो आप कह
रिया था के ९३
के बाद से
बॉम्बे बहुत चेन्ज
हो गया।
Lallan Gupta: हाँ। ९३
में क्या हुआ, हम
बॉम्बे में थे
यहाँ पर तो हम
तो हिन्दू हैं।
हमारे तीन
दोस्त थे, वो
मुस्लिम थे
वो। बॉम्बे
में हमारे दो
या तीन दोस्त
थे, वो
मुस्लिम। मैं
उनसे बात करना,
उनके साथ
बैठना, उनके
घर में खाना
खाना। मैं कभी
ऐसा नहीं लगता
था कि ये गैर
लोग हैं। फिर
वो ९३ में बम
ब्लास्ट हुआ, हिन्दू
मुसलमान का
राइट हुआ थोड़ा,
चारो बाजू
थोड़ा थोड़ा,
बनारस में हुआ,
बॉम्बे में
हुआ, सब जगह
में हुआ तो
लोगों में, एक
दूसरे में
थोड़ा नफ़रत
पैदा हो गया।
मगर जो समझदार
लोग हैं उनके
अंदर नही हुआ
है। हाँ। जो अनपढ़
हैं, गँवार
हैं, इन लोगों
में थोड़ा नफ़रत
पैदा हो गया, बाकी
जो लोग, नेता
लोग हैं, कराते
हैं ये सब
झगड़ा, कि आपस में
ये लोग झगड़ा
करें। नहीं तो
९३ के पहले
कोई जानता ही
नहीं था
हिन्दू है कि
मुसलमान है।
सबका -- वो लोग
के लिये कभी
एक किलो, आधा
किलो जैसा
हमारी हैसियत
है, उनको हम
मिठाई ले के
जाते थे, दिवाली
के दिन, और वो
लोग अपने
त्योहार को
बिरयानी
वगैरह बुला के
खिलाते थे, घर
में खिलाते
थे। अब ये सब
बातें बहुत
खतम हो गई।
Kabi: खतम हो गया?
Lallan Gupta: हाँ।
बहुत कम है
अभी। अभी १००
में २५% है बस।
Kabi: तो आपके तीन
चार दोस्त
आपके थे। तो
अभी भी आपके
दोस्त हैं?
Lallan Gupta: हाँ। अभी
भी हमारा एक
दोस्त है। एक
है। और एक तो
बाहर गाँव चले
गये थे तो XX
बहुत वो बम्बई
से बाहर चले
गये।
उन्होंने अच्छा
पैसा कमाया।
हम बम्बई में
रह गये। कुछ
ज्यादा नहीं
कमाये।
Kabi: ओ के।
Lallan Gupta: हाँ। XX
Kabi: अच्छा। तो
अभी ये नया
टैक्सी
निकली।
Lallan Gupta: जी। ऐरो।
Kabi: नेरोग
टैक्सी।
Lallan Gupta: नेरो
हाँ।
Kabi: XX टैक्सी। ये
प्रायवेट
में। ये आपके
लिये अच्छा है?
Lallan Gupta: नहीं।
हमारे लिये तो
अच्छा नहीं है
मगर हम चाहते
हैं।
Kabi: क्यों?
Lallan Gupta: ये नया
जमाना है तो
नये हिसाब से
वो लोग जो चला रहे
हैं वो अच्छा
कर रहे हैं
क्योंकि -- देखिये,
एक आदमी वो है, दिन
का १०० रुपया
कमाता है, एक
आदमी वो है, २००
रुपया कमाता
है, एक आदमी
५००, हजार, लाख
कमाता है। तो
उसको भी
टैक्सी की ही
जरूअत पड़ती
है। आज जिसकी
गाड़ी -- दो तीन
गाड़ी है, सिटी
होण्डा, होण्डा
सिटी या दूसरी
गाड़ी, तो दो
गाड़ी होने के
बावजूद भी वो
हमारी गाड़ी को
लेता है वो, टैक्सी
को। तो उसको
कम से कम अब ये
सुविधा मिला
है कि वो फ़ोन
कर के बुला
सकता है और के
भई आप हमको
टैक्सी ले के
आओ तो उसको
ऐसी गाड़ी
मिलेगा और वो
सुख से जायेगा
-- मतलब --
क्योंकि वो
ज्यादा कमाता
है, दो पैसा
खर्चा कर सकता
है। और जो लोग
नहीं खर्चा कर
सकते हैं तो
अपना ये काला
पीला -- उसके
अन्दर ये
टैक्सी में
जाते हैं लोग।
Kabi: तो आपका
धन्धा डाउन
नहीं होगा?
Lallan Gupta: नहीं।
धन्धा हमारा
डाउन नहीं
होगा क्योंकि
हमारा मीटर
इतना कम है कि
यहाँ के पैसे
वाले भी यही
टैक्सी पकड़ते
हैं। अभी जो
नया लोग है, नया
जो ऑफीसर लोग
है, बड़ा बड़ा, नया
सेठ लोग है जो
कि ए सी में
दिन भर रहता
है तो गर्मी
में ये टैक्सी
में जाने में उनको
तकलीफ होता है
तो वो लोग वो
टैक्सी इस्तेमाल
करते हैं और
हमारे खयाल से
आस्ते आस्ते
हम लोग भी जो
भी नया गाड़ी
लेंगे, उसके
अंदर ए सी
होगा। तो एक
से ज्यादा
नहीं अभी एक
पाँच दस साल
में सब चेन्ज
हो जायेगा। तो
ये जितना अब
ये काला पीला गाड़ी
देख रही हैं, उसके
जगह पर सब ए सी
हो जायेगा, तो
सेम हो गया
सब।
Kabi: हाँ, सेम हो
गया सब। तो
टैक्सी में
लोग कमाते कि
नहीं कमाते?
Lallan Gupta: कमाते
हैं। ये -- एक जिनकी
खुद की टैक्सी
है। ३००, ४००
रूपये कमा
लेते हैं। मगर
आज ३००, ४००
रुपये कमा
लिये तो कल वो
४००, ५०० का
खरचा भी आता
है।
Kabi: हाँ, आता है।
Lallan Gupta: क्योंकि
आज ये खराब हो
गया, वो खराब
हो गया, तो ये
जो हम आज का जो
धन कमाये हैं
तो कल वो खरचा करना
पड़ता है। तो
आज का जो
कमाया है वो
भी गया और कल
हमारा गाड़ी जो
गैरेज में खड़ा
है पूरा दिन, वो
भी गया और ये
जो कमाया हुआ
खरचा, वो भी
गया। यानी तीन
-- एक दिन गाड़ी
खराब होती है
तो तीन दिन
पीछे होते हैं
हम।
Kabi: कितना
साल है ये? कोइ
ना ऐसे भाग के
वो बिगेर -- पैसा
नहीं दिया।
Lallan Gupta: हाँ। ऐसा
कोइ कोइ -- वो जो
होते हैं, वो
उनको चीटर
बोला जाता है।
जैसे कि उनका
धन्धा।
Kabi: हाँ।
चीटर, चीटर।
Lallan Gupta: हाँ।
उनका काम ही
वही है। वो
क्या करते हैं,
मालूम है? वो
देखते हैं कि
ये आदमी का
एक्सपिरियेंस
कितना है।
थोड़ा बात करो।
थोड़ा बात करने
में मालूम पड़
जाता है कि ये
आदमी नया है
या पुराना है
या ऐसा। तो वो
लोग क्या करते
हैं, मालूम है? 500 का
नोट
दिखायेंगे।
पहले जायेंगे
वहाँ पर, दुकान
पे, बोलेंगे
भाईसाहब मुझे
ये सामान लेना
था, छुट्टा
नहीं है। आप
मुझे १००
रुपया देना।
मैं आपको आगे
छुट्टा करके
दूँगा। तो ये
तो १०० रूपया
हम से ले
लिये। अभी आये,
आये तो इतना
दूर से। हमारा
मीटर का
किराया भी हो
गया ७०, ८० रूपया
और १०० रुपया
कैस भी ले के
गया। और बोलता
मैं यहाँ
छुट्टा लेता
हूँ तो गाड़ी
वहाँ खड़ा करेगा।
दूर और चल के
पीछे आयेगा।
वो किसी गली में
से निकल के
भाग जायेगा।
Kabi: ऐसा।
Lallan Gupta: मगर ये
हम लोग सकल
देख के छोड़ते
हैं। हम लो जो
भरोसा का -- अभी
मैं ऐसा करता
हूँ मगर बाकी
जो लड़के लोग
हैंü वो
नये नये लड़के
लोग फँस जाते
हैं।
Kabi: तो आपका
हो गया था एक
बार ऐसे
चीटिंग?
Lallan Gupta: हाँ।
चीटिंग हुआ
था। एक दो बार
हो चुका है।
फिर उसके बाद
नहीं हुआ है।
Kabi: सीख ही
गये।
Lallan Gupta: हाँ। सीख
गये हम।
Kabi: तो ऐसी
चाली समय आपने
सब कुछ देखे
हो?
Lallan Gupta: बहुत कुछ
देखा।
Kabi: हाँ तो
क्या देखे? ये XX
Lallan Gupta: हमने
बहुत कुछ ये
देखा कि
पुराने लोग कैसे
थे, आज के लोग
कैसे हैं, मुझे
पुराने लोग
अच्छे लगते
थे। अभी जो
मिलते हैं,
पुराने
बरताब। और
बॉम्बे में उस
वक्त क्या था, ५०
साल पहले। लोग
गरीबी से ऊपर
आये थे। मतलब
ये बॉम्बे एक
ऐसा सिटी है
कि यहाँ पर
कोई भी आदमी
कुछ लेकर नहीं
आया था। यहाँ
पर हर आदमी
नंगा आया था।
हाथ में
सूटकेस पकड़ के
या तो हाथ में
थैली ले कर
के। कभी कपड़ा
बदल कर दो है
कि नहीं है, क्या
मालूम। खाये, पानी
का गिलास है
कि नहीं, क्या
मालूम। वो लोग
कुछ नहीं लाये
थे। यहाँ पर
काम करके यहाँ
पर, अपनी
बुद्धि से
लोगों ने पैसा
बनाया। यहाँ
पर आज जिसकी
चार
बिल्डिंगे, दस
बिल्डिंगे
हैं, वो भी कुछ
नहीं लाया था।
आज वो पचास
साल में चार
बिल्डिंग, पाँच
बिल्डिंग का, दस
बिल्डिंग का
मालिक है। और
आज कल वो गाँव
से कुछ नहीं
लाया था। यानी
कि वो बॉम्बे
में आया तो
उसको खाने के
लिये भी कल का
ठिकाना नहीं
था। तो आज
लोगों ने -- यही
फरक पड़ा है कि
लोगों ने
बॉम्बे में आ
कर के अपने
दिमाग से
तरक्की किया
है।
Kabi: आप कुछ
और कहना चाहते?
Lallan Gupta: बस
Kabi: मन से।
Lallan Gupta: आपने।
Kabi: आपका
क्या ख्वाहिश
है?
Lallan Gupta: अब हमारी
ख्वाहिस है
मैडम, अब
हमारी उम्र
बहुत कम हो
चुकी है। लोग
तो कहते हैं
कि ज्यादा है
मगर मैं बोलता
हूँ मेरी उम्र
कम रहे। कम
होते जा रही
है और मैं खुस
हूँ। मैं जो
भी हूँ। ६५
साल का उमर है
तो फिर भी मैं
अपना कमा के
खा रहा हूँ।
मेरा कोई बेटा
नहीं है। ना
ही मेरा कोई
फण्ड सर्विस
है। जब तक ये
हाथ पैर चलेगा,
हम खायेंगे।
और बुढ़ा हो
गया तो ये
गाड़ी किसी को
दे देंगे, अच्छा
भाई तुम चलाओ।
जो देना है वो
देना हमको। बस
ये हमारी लाइफ़
है। और
Kabi: पर
ख्वाहिश क्या
है?
Lallan Gupta: ख्वाहिश
हमारी तो मैडम,
बहुत कुछ हो
सकता है कि
हमको एक अच्छा
-- आज हमारा खुद
का घर नहीं
है। हम ये सोचते
हैं खुद -- खुद
का भले ही
कहीं भी हाई
बोरीवली में
दो ढाई लाख
रुपये का घर
मिलता है। एक
अच्छा घर ले
ले ताकि हम
बूढ़े हो
जायेंगे तो
पता नहीं,
भगवान हमको
किस हाल -- आज भी
हमको रोज
सोचना आता है
कि आज हम
ज्यादा बूढ़े
हो गये, हम कभी
चल नहीं पाये, बाथरूम
जाना है तो
कहाँ
जायेंगे। आज
हम वो
गवर्मेण्ट ही
क्वार्टर्स
में रहते हैं, मैं
और मेरी बीबी
तो कल कैसा
दिन आयेगा,
क्या मालूम।
बस ये सोच के
कभी कोई बहुत
दुख होता है।
मैं १५ साल की -- १४
साल की उमर से
मैं ने अपना
कमा के खाया
है। हाँ। मैं
और किसी का
नहीं जानता
हूँ यहाँ।
Kabi: I hope you enjoyed listening. It
was a long ranging conversation with Gupta ji and there are five outtakes on
the Meter Down blog, along with Gupta ji's picture. The blog address is,
MeterDown.WordPress.com. I welcome your comments and suggestions. You can leave
them in the comment section of the blog or you can email me at
cubbykabi@yahoo.com. And I hope you join me again when we write this city in
conversation with another Bombay taxi driver. Til next time.